परमात्मा का स्वरुप

संसार में जितने ईश्वर में विश्वास करने वाले लोंग हैं परमात्मा के भिन्न भिन्न स्वरूपों को मानते हैं | कुछ अपने ही ईश्वर को लेकर झगडा भी करते हैं कुछ सब सही हैं यह कहे कर ईश्वर अर्थात परमात्मा के स्वरुप पर चिंतन व चर्चा नहीं करते | पर सत्य तो एक ही होता हैं, परमात्मा भी एक स्वरुप हैं और उस सत्य स्वरुप का पता चल जाए तो दुनिया के झगडे ही खत्म हो जाए | एक स्वरुप इस लिए हैं क्यों की सृष्टि भी एक हैं यदि ईश्वर भिन ...

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परमात्मा के विविध नाम

 किसी का भी संबोधन हम उसके नाम से करते हैं | नाम हमारे गुणों के सूचक हैं नियमानुसार रखे जाए अतः नाम गुण, कर्म और स्वभाव अनुसार रखे जाते हैं | उस परमात्मा के तो असंख्य गुण हैं हमें परमात्मा के उन गुणों के बारे उसके भिन्न नामो के साथ वेद ज्ञान करते हैं | सृष्टि के आदि में मानवजाती के उत्थान के लिए परमात्मा ने आदि ऋषियों के माध्यम से अपना ज्ञान प्रकट किया जिसे हम वेद के नाम से जानते हैं | वेद में वर्णित एक-एक ...

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मांस मनुष्य का भोजन नहीं

जो चीज़ जिस योग्य हैं उसका यथा योग्य उपयोग ही धर्मं हैं | मनुष्य सर्वाहारी नहीं, के सब कुछ खा जाए | खाने वाले तो काच, बल्ब, ट्यूब लाइट खा जाते हैं मिटटी गोबर इत्यादि तो इस से वह उनका भोजन नहीं हो जाता | मांस हमारे भोजन के लिए नहीं, और हमारी आतंरिक संरचना मांसाहार के लिए नहीं हैं | इसीलिए मांसाहार अधर्म कहा गया हैं | स्वामी ओमानंद सरस्वती की लिखी यह पुस्तक तार्किक ढंग से सिद्ध करती हैं के मांसाहार मनुष्यों के ...

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वैदिक संस्कृति में देवता

माना जाता हैं के हमारे यहाँ ३३ करोड़ देवी देवता हैं | मैं सहमत हू अपितु मैं तो संख्या और ज्यादा होने का अनुमान रखता हू | ३३ करोड़ संभवतः यह बता रहा हैं के बहुत से देवता रहे हैं संख्या अगण्य हैं | हम लोंग देवता और देवी शब्द का अर्थ ही भूल गए हैं जो सिर्फ ३३ करोड़ पर रुक गए | हमारी तो संस्कृति ही देव संस्कृति कही गयी हैं | देव संस्कृति अर्थात दूसरों को देने वाली संस्कृति | क्यों की हमारे यहाँ तो सदैव से लोंग देव ...

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जीवन का उद्देश्य

क्यों हमने जन्म लिया ? आनंद भोग, क्या सिर्फ इसलिए ? इस जीवन के बाद हमारा क्या होगा ? भिन्न-२ मतवालो की भिन्न-२ मान्यताए हैं | किसी की मान्यता में हमने इसलिए जन्म लिया हैं के हम स्वर्ग में प्रवेश पाने को अपनी योग्यता सिद्ध कर सके | स्वर्ग कई सारे मत वाले लोगो के लिए आदर्श स्थान हैं बहुत से हिंदू भाइयो के लिए ऊपर चार धाम हैं गोकुल,शिवलोक, वैकुण्ठ, साकेत लोक तो हमारे मुस्लिम भाई ज़न्नत मानते हैं | पर हर कोई सिर ...

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ब्रह्माण्ड के अनादी तत्व

हर विवेकी मनुष्य में अपार जिज्ञासाए होती हैं | किसी में कम किसी में ज्यादा | हमें किसने बनाया ? क्यों बनाया ? कैसे बनाया ? अगर बनाने वाला परमात्मा हैं तो उसका स्वरुप कैसा हैं ? ईश्वर के संसार निर्माण की प्रक्रिया ? और जिसने भी हमें बनाया उसे किसने बनाया ? इत्यादि इत्यादि बहुत से प्रश्न हमारे मस्तिष्क में कभी ना कभी घूमते ही हैं | पर इन सवालो के लिये भी आवयश्क हैं के ब्रह्माण्ड में क्या-क्या हैं, जिसे हम जान ...

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जब बोध होता हैं…..

बोध जब होता हैं तो समाज में क्रांति आती हैं | सर आइस्सक न्यूटन से पहले कितनो ने सेब को गिरते देखा पर गुरुत्व के सिद्धांत तक आधुनिक युग में सिर्फ एक ही पंहुचा | बोध तभी होता हैं जब सत्य को जानने की जिज्ञासा होती हैं, सत्य तक पहुचने के ली पुरुषार्थ करने का सामर्थ्य होता हैं |  और उस से भी बढ़कर जब सत्य को स्वीकारने का साहस होता हैं | सामान्य सी रोजमर्रा में देखने वाली चीज़ के सत्य को हम स्वीकार नहीं करते और इ ...

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इदं न मम्

  इदं ना मम् अर्थाथ ये मेरा नहीं | ये हमारी संस्कृती का  सूत्र हैं | जो मेरा नहीं वो मैं नहीं रख सकता | सोचिये अगर हर कोई  इस सूत्र पर चले तो कही कोई अपराध ना हो | जो दुर्भावनाए आये वो इसी सूत्र के साथ वापस चली जायेंगी | चाहे वो परीक्षा केंद्र मे आपको मिल ने वाली मुफ्त नकली क्यों ना हो | जो ज्ञान मेरा नहीं उसका मैं अधिकारी नहीं | जो चीज़ मेरी नहीं ना मैं उसको रख सकता हू ना ही दूसरे की कृति का श्रेय ले सकता ...

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महामृत्युंजय मन्त्र का रहस्य

कुंडली देख कर पंडित जी कहते हैं आपके बेटे की अल्प आयु हैं आप को तो मन्त्र का जाप करना चाहिए इतना रुपया लगेगा | और लोंग मृत्यु भय से कराते हैं | पंडित भी मुह में मसाला दबाए औपचारिकता पूरी करता हैं |  ईश्वर कब से पैसा ले कर प्रार्थना करने वाले और पैसा दे कर प्रार्थना करवाने वाले की सुनने लगा | पंडित या विद्वान की अव्य्सकता होती हैं परन्तु सामाजिक कर्मकांड में | फिर कितने लोंग महामृत्युंजय मन्त्र का अर्थ जानते ...

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वैदिक राष्ट्र गान

  वैदिक राष्ट्र गानम् ! ओ३म् ! आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒म रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शूर॑ऽइष॒व्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्री॑ धे॒नुर्वोढा॑न॒ङ्वाना॒शुः सप्ति॒ः पुर॑न्धि॒र्योषा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॑यतां निका॒मेनि॑कामे नः प॒र्जन्यो॑ वर्षतु॒ फलव॑त्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगक्षे॒मो नः॑ कल्पताम् (यजु २२/२२)   Meaning: O God! let there be born in ...

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